यह अ/ययन सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के वास्तविक कार्यान्वयन और समन्वय को म/य प्रदेश राज्य में बढ़ते किशोर साइबर अपराधों की पृष्ठभूमि में विश्लेषित करता है (गोयत, 2025 शर्मा - देसाई, 2023)। डिजिटल युग में मोबाइल और इंटरनेट की आसानी से उपलब्धता के कारण किशोरों द्वारा किए जाने वाले साइबर अपराधों में लगातार वृद्धि हो रही है, जिनमें सोशल मीडिया आधारित अपराध, ऑनलाइन उत्पीड़न, ऑनलाइन धोखाधड़ी और डेटा चोरी शामिल हैं (यादव, 2025 यूरोपोल, 2024)। ऐसे में, पुनर्वासात्मक न्याय और दंडात्मक कार्रवाई के बीच संतुलन बनाने की चुनौती विधिक ढाँचा के सामने है (शर्मा - मल्होत्रा, 2023)। अ/ययन में प्रारंभिक डेटा के लिए अर्ध-संरचित साक्षात्कार और प्रश्नावली के मा/यम से 247 लोगों (पुलिस अधिकारी, साइबर विशेषज्ञ, वकील तथा गैर-सरकारी संगठन के प्रतिनिधि) से बातचीत की गई। डेटा के गुणात्मक विश्लेषण और मात्रात्मक विश्लेषण में χ2 परीक्षण, टी-टेस्ट और सहसंबंध विश्लेषण का उपयोग किया गया (कुमार, मिश्रा - पटेल, 2023)। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के प्रति पुलिस अधिकारियों की जागरूकता अपेक्षाकृत अधिक थी, और प्रशिक्षित अधिकारियों की मामलों के समाधान में अधिक क्षमता पाई गई। न्याय प्रक्रिया को सुचारु रूप से चलाने में ग्रामीण क्षेत्रों में फोरेंसिक उपकरणों की कमी और तकनीकी विशेषज्ञों की कमी बाधा बन रही है। इसके अलावा, दोनों कानूनों में कानूनी अस्पष्टताओं के कारण दंड निर्धारण में कठिनाई और मामलों के निपटान में देरी हुई। अ/ययन कहता है कि किशोर साइबर अपराधों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिए कानूनों में बदलाव, तकनीकी प्रशिक्षण, फोरेंसिक अवसंरचना का विस्तार और पुनर्वास आधारित डिजिटल परामर्श कार्यक्रमों की जरूरत है।
Article DOI: 10.62823/IJAER/2025/01/04.124